राजा राममोहन राय

राजा राममोहन राय

  • 19वीं शताब्दी में जो समाज और धर्मं सुधार आन्दोलन बंगालसे प्रारम्भ हुआ, उस आन्दोलन का नेतृत्व राजा राममोहन राय ने किया था|राजा राममोहन राय ने सामाजिक और धार्मिक सुधार करने का प्रयास किया तथा समाज में व्याप्त रूढ़ीवाद काविरोध किया|
  • राजा राममोहन राय ने तत्कालीन समाज में महिलाओं के प्रति व्याप्त बुराइयों जैसे- सती प्रथा, बाल विवाह, पर्दा प्रथा आदि का विरोध किया तथा महिलाओं को भी पुरुषों के समान शिक्षा और समाज में इनके अधिकारों का समर्थन किया|राजा राममोहन रायद्वारा समाज के प्रति किये गये इन महत्वपूर्ण सुधारों के कारण ही इन्हें आधुनिक भारत का पिता कहा जाता हैं|
  • राजा राममोहन राय को आधुनिक भारत का पिता, सुधार आन्दोलनों का प्रवर्तक, नव प्रभात का तारा, नव जागरण का अग्रदूततथाप्रथम राष्ट्रीय व्यक्तिभी कहा जाता है|
  • राजा राममोहन राय बचपन से ही विद्रोही स्वाभाव के थे|केवल 15 वर्ष की आयु में ही इन्होंने एक लेख के माध्यम से मूर्तिपूजा की आलोचना की थी|राजा राममोहन राय नेपाल जाकर बौद्ध दर्शन का ज्ञान प्राप्त किया था|
  • राजा राममोहन राय ने एक लेखन शैली विकसित की थी|इस लेखन शैली की प्रशंसा करते हुए अंग्रेज विद्वानबेंथमने कहा था कि,अगर हमें यह न मालूम होता कि इस लेखन शैली को एक हिन्दू ने तैयार किया है, तो हम यही सोचते किकिसी उच्च कोटि के अंग्रेज विद्वान ने इसे तैयार किया है|
  • राजा राममोहन राय बहुभाषाविद् थे|इनका पहला ग्रन्थ तुहफत-उल-मुहदीन” था|यह ग्रन्थ फारसी भाषा में लिखा गया था|राजा राममोहन राय नास्तिक नहीं थे बल्कि इनका विश्वास एक ईश्वर में था|राजा राममोहन राय ने मिरात-उल-अखबार नामक एक अन्य पुस्तक लिखी| मिरात-उल-अखबार का अर्थ है- एकेश्वरवादियों को उपहार|इस पुस्तक में इन्होंने एकेश्वरवाद को सभी धर्मों का मूल बताया था और मूर्तिपूजा का विरोध किया था|
  • राजा राममोहन रायजातिप्रथा का पुरजोर विरोध किया था|जातिप्रथा के सम्बन्ध में राजा राममोहन राय ने कहा था कि, जातिप्रथा ने हमारे समाज में उच्च और निम्न जैसे अप्राकृतिकपुत्रों में बाँट दिया है जिसके चलते हमारे समाज का विशाल तबका राष्ट्रीयता की भावना से दूर होता जा रहा है|
  • राजा राममोहन राय ने 1815 ई० में आत्मीय सभा का गठन किया था|एक डचडेविड हेयर के सहयोग से 1917 ई० में कलकत्ता में हिन्दू कॉलेज की स्थापना की थी| इसके बाद 1825 ई० में इन्होंने वेदांत कॉलेज की स्थापना की|
  • राजा राममोहन रायके विचारों पर ईसाई धर्म का प्रभाव था|ये हिन्दू धर्म-दर्शन और हिन्दू संस्कृति को श्रेष्ठ मानते थे किन्तु इनका मानना था कि तत्कालीन हिन्दू समाज में जो बुराइयाँ प्रवेश कर गई हैं, उन्हें पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान के माध्यम से ही दूर किया जा सकता है|
  • 1820 ई० में राजा राममोहन राय ने बायबिल का अनुवाद Precepts of jesus के नाम से किया|राजा राममोहन राय ने यह बताने का प्रयास किया कि केवल हिन्दू धर्म में ही अन्धविश्वास नहीं है बल्कि ईसाई धर्म में भी अन्धविश्वासों को देखा जाता है, इसके बावजूद राममोहन राय ईसाई धर्म के अच्छाइयों को कहीं ज्यादा महत्व देते थे|
  • राजा राममोहन राय ने 1820 ई० में लिखित पुस्तक Precepts of jesus में ईसाई धर्मं में व्याप्तअन्धविश्वासोंका विरोध किया और केवल ईसाई धर्म के अच्छाइयों का ही उल्लेख किया था| Precepts of jesus में इन्होंने पिता, पुत्र और परमात्मा अर्थात् चमत्कारीकहानियों का विरोध किया और मात्र नैतिक तत्वों की ही प्रशंसा की थी|हिन्दू धर्म के प्रति इनके आलोचनात्मक दृष्टिकोण को देखते हुए इनके ईसाई मित्रों ने यह उम्मीद की थी कि राजा राममोहन रायईसाई धर्म ग्रहण कर लेंगे किन्तु ऐसा नहीं हो सका|
  • 20 अगस्त,1928 ई० को राजा राममोहन राय ने ब्रह्म सभा के नाम से एक नए समाजकी स्थापना की|बाद में ब्रह्मसभाको ब्रह्मसमाज नाम दिया गया|ब्रह्म समाज हिन्दू धर्मं के अंतर्गत ही हिन्दू रीति-रिवाजों में एकसुधारवादी संस्थाथी|ब्रह्म समाज का उद्देश्य राजा राममोहन राय के मान्यताओं के आधार पर हिन्दू समाज में सुधार करना था|
  • ब्रह्म समाज की अवधारणा एकेश्वरवाद पर आधारित थी|राजा राममोहन राय ने जाति प्रथा का विरोध किया| जाति प्रथा का विरोध करने के साथ-साथइन्होंनेस्त्रियों कीसामाजिक दशा को सुधारने के लिए लगातार आवाज उठाई|
  • राजा राममोहन राय ने सती प्रथा का विरोधकरने के लिए संघवाद कौमुदीनामक एक पत्रिका प्रकाशित करवाई|इस पत्रिका में इन्होंने सती प्रथा का पुरजोर विरोध किया| सती प्रथा के खिलाफ इनकेलगातार किये गये प्रयासों के कारण हीलॉर्ड विलियम बेंटिक की सरकार ने 1829 ई० में सती प्रथा एक्ट पारित किया| इस एक्ट के नियम-17 के द्वारा सती प्रथा को हत्या के समान अपराध घोषित किया गया और ऐसा करने के लिए मजबूर करने वालों के लिए मृत्युदंड का प्रावधान किया गया था|
  • राजा राममोहन रायन केवल राष्ट्रीय बल्कि अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं में भी काफी गहरी दिलचस्पी रखते थे|ये न केवल राष्ट्रीयता बल्कि अंतर्राष्ट्रीयता के भी प्रबल समर्थक थे|जहाँ कहीं भी स्वतंत्रता के लिए आन्दोलन चलाया जाता था, राजा राममोहन राय उसका समर्थन किया करते थे| उदहारण के लिए- 1823 ई०में स्पेनिश क्रांति की सफलता पर इन्होंने व्यक्तिगत रूप से ख़ुशी व्यक्त करते हुए लोगों को व्यक्तिगतभोज पर आमंत्रित किया था|
  • राजा राममोहन राय को भारतीय पत्रकारिता अग्रदूत कहा जाता है|इन्होंने 1821 ई०में बंगाली पत्रिकासंघवाद कौमुदी का प्रकाशन किया था| राजा राममोहन राय ने बंगला भाषा के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया और एक बंगला व्याकरण का भी संकलन किया था|20 अप्रैल,1822 ई० मेंफारसी भाषा मेंमिरात-उल-अखबारनामक पत्रप्रकाशित किया| 1821ई०में इन्होंने अंग्रेजी भाषा में दूसरी पत्रिका भी प्रकाशित करवाई, इस पत्रिका का नाम ब्रह्म मैनिकल मैग्जीन था|
  • राममोहनराय को राजा की उपाधि मुगल सम्राट अकबर द्वितीय ने दी थी और साथ ही इन्हें ब्रिटिश सरकार से मुलाकात करने के लिए इंग्लैंड भेजा था| राजा राममोहन राय समुद्री मार्ग से विदेश गये थे| राजा राममोहन राय समुद्री मार्ग से विदेश जाने वाले प्रथम भारतीय थे| इनकी मृत्यु 1833 ई० में ब्रिस्टल में हुई थी|

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Ramesh
December 26, 2021, 8:31 am

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