1857 की क्रांति के कारण – 2

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  • ब्रिटिश सेना में भारतीय सैनिक अनेक कारणों से असंतुष्ट थे|भारत में ब्रिटिश शासन के इतिहास में सैनिकों का पहला विद्रोह, 1764ई० में ही घटित हुआ था|प्लासी के ठीक बाद जब 1764 ई० में बंगाल में अंग्रेज सत्ता हासिल करने के लिए बक्सर का युद्ध लड़ रहे थे, तब हेक्टर मुनरो की एक भारतीय टुकड़ी मीर कासिम से जा मिली थी|इसे हम भारतीय इतिहास मेंब्रिटिश शासनकाल के दौरान हुआपहला सैनिक विद्रोह मानते हैं|
  • सेना में प्रथम धार्मिक विद्रोह, 1806 ई० में हुआ था|वैसे तो यह सैनिकों द्वारा किया गया दूसरा विद्रोह था, लेकिन इसेप्रथम धार्मिक विद्रोह माना जाता है|इस विद्रोह के पीछे धार्मिक कारण विद्यमान थे|1857ई० के विद्रोह का तात्कालिक कारण भीधार्मिक ही माना जाता है|
  • भारत का गवर्नर-जनरल लॉर्डविलियम बेंटिकथा| यह मद्रास का गवर्नर रहते हुए एक आदेश जारी करके सैनिकों को पगड़ी धारण करने, तिलक लगानेऔर कान में कुंडल पहनने पर प्रतिबंध लगा दिया था|लॉर्डविलियम बेंटिक के इस आदेश के खिलाफ वेल्लोर के सैनिकों ने विद्रोह कर दिया| इस विद्रोह को हम सेना में प्रथम धार्मिक विद्रोह कहते हैं|
  • सेना में दूसरा धार्मिक विद्रोह, 1824 ई० में हुआ था|ब्रिटिश सरकार ने बर्मासे युद्ध करने के लिए भारतीय सैनिकों को समुद्र पार करके बर्मा जाने का आदेश दिया|इस आदेश को मानने से भारतीय सैनिकों ने इंकार कर दिया क्योंकि उस समय तक मान्यता थी कि समुद्र पार करने से धर्मं भ्रष्ट हो जाता है|इस प्रकार 1824ई० में बर्मा जाने के लिए ब्रिटिश सरकार की 48वीं रेजिमेंट ने इंकार कर दिया|इसी को भारतीय सेना का दूसरा धार्मिक विद्रोह कहा जाता है|
  • सैनिकों की इस तरह की क्रिया कलापों के कारण ही 1856 ई० में जब लॉर्डकेनिंगगवर्नर बना तो इसने एक सेना भर्ती अधिनियम पारित किया|इस अधिनियम के तहत सरकार ने यह प्रावधान किया कि ब्रिटिश सेना में भर्ती के बाद कभी भी आवश्यकता पड़ने पर समुद्र के पार भेजा जा सकता है और इस सम्बन्ध में कोई भी अभ्यर्थी इसे इंकार नहीं कर सकता है और यदि कोई इसे मानने से इंकार करता है, तब उसके खिलाफ दंड का प्रावधान किया जायेगा|
  • इसके अलावा भी भारतीय सैनिकों के असंतोष के कई कारण थे, उदाहरण के लिए भारतीय सैनिकों का वेतन ब्रिटिश सैनिकों की तुलना काफी कम होता था|इसके अतिरिक्त भारतीय सैनिकों को गोरे अधिकारियों के द्वारा हमेशा अपमानित होना पड़ता था|हर भारतीय सैनिक वास्तव में एक वर्दीधारी किसान ही था|ब्रिटिश शासन के औपनिवेशिक नीतियों से भारतीय किसान उत्पीड़ित होता था तो इसका प्रभाव सैनिकों पर भी पड़ता था क्योंकि हर सैनिक किसी न किसी किसान का ही बेटा था|
  • ब्रिटिश सेना में बंगाल कमान सबसे बड़ी थी और बंगाल कमान के अधिकतर सैनिक अवध कमान से आते थे|जब लॉर्डडलहौजी ने अन्याय पूर्ण ढंग से कुशासन का आरोप लगाकर अवध का विलय कर लिया तोनवाबवाजिदअली शाह ने अवध की गद्दी छोड़ दी| इस घटना से न केवल अवध की जनता की भावनाएँ आहत हुई थीं, बल्कि इसका प्रभाव अवध के सैनिकों पर भी पड़ा था|
 
  • अवध के सैनिकों की निष्ठा ब्रिटिश शासन में कम और अपने राजा में कहीं ज्यादे थी|साथ ही बंगाल कमान के अधिकतर सैनिक तथाकथित ऊँची जाति के थे,जो प्रायः अंग्रेजी अनुशासन और तौर-तरीके को स्वीकार नहीं कर पाते थे|
  • इसके साथ ही तत्कालीन समय में अंग्रेजी टुकड़ी में सैनिकों का अनुपात 5:1का होता था अर्थात भारतीय सैनिक यह भी देख रहे थे कि, हम संख्या में ज्यादा हैं और हमें ब्रिटिश हुकूमत की तरफ से उत्पीड़ित किया जा रहा है इसलिए उनका मनोबल और भी बढ़ गया|
  • ब्रिटिश सेना में इस्तेमाल की जाने वाली बंदूकों का नाम ब्राउन बेस था|1856 ई० में लॉर्डकेनिंग की सरकार ने ब्राउन बेस बन्दूकों के स्थान पर न्यूं इनफिल्ड रायफल का उपयोग करने का निर्णय लिया|न्यूं इनफिल्ड रायफल में कारतूस भरने के लिए कारतूस को पहले मुंह से खीचना पड़ता था|
  • बंगाल सेना में तीन प्रमुख छावनियां थीं –बैरकपुर,बहरामपुर और दमदमछावनी|मंगल पाण्डेय, बैरकपुर छावनी के थे|
  • बंगाल सेना में तीनोंप्रमुख छावनियों में यह अफवाह फ़ैल गयाकि कारतूसों के जिस हिस्से को दांत से खींचा जाता है, वह वास्तव में गाय और सूअरके चर्बी का बना हुआ है| सैनिकों को लगा कि अंग्रेज उनके धर्म को भ्रष्ट करना चाहते हैं,इससे सेना में उच्च जातियाँ भड़क उठीं और दमदम में सेना ने सबसे पहले कारतूस को मुंहसे लगाने से इंकार कर दिया|
  • 29 मार्च, 1857 ई०को मंगल पाण्डेय ने एक अंग्रेज को गोली से उड़ा दिया और बाद में मंगल पाण्डेय को फांसी पर लटका दिया गया|विद्रोह की वास्तविक शुरुआत 10मई,1857 ई० को मेरठ से होती है|10 मई, 1857 ई०को मेरठ के सैनिकों ने इसी चर्बी युक्त कारतूस वाले मुद्दे पर अपने अंग्रेज अधिकारियों पर गोलियां बरसा दींऔर दिल्ली की ओर रवाना हो गये|
   
  • 11 मई, 1857 ई० को विद्रोही सैनिकदिल्ली पहुंचे|12 मई, 1857 ई० को विद्रोही सैनिकों ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया और बहादुरशाह द्वितीय (जफ़र) को दिल्ली का सम्राट घोषित कर दिया|
  • इस तरह से सभी सैनिकों ने बहादुरशाहद्वितीय (जफ़र)को विद्रोह का नेता बना दिया|चूँकि बहादुरशाह जफरबहुत अधिक बुढा हो चुका था और उसके पास अब पहले की तरह सैनिक शक्ति भी नहीं थी, फिर भी बहादुरशाह जफरने विद्रोह का नेता होना स्वीकार कर लिया|इस प्रकार 1857 ई० में हुए विद्रोह को एक नेता मिल गया|
  1857 के विद्रोह का प्रसार
  • 10 मई,1857 ई० को मेरठ के बैरकपुर में जो विद्रोह छिड़ा था, वह देखते ही देखते देश के अन्य क्षेत्रों में भी फ़ैल गया|यह विद्रोह केवल उत्तर भारत में ही फ़ैल सका और उत्तर भारत में भी इस विद्रोह का प्रसार मुख्य रूप से उत्तर पश्चिमी प्रान्त (उत्तर प्रदेश), बिहार और मध्य प्रान्त के क्षेत्रों तक ही सीमित रहा| उड़ीसा तथा कश्मीर में इस विद्रोह को विशेष समर्थन प्राप्त नहीं हुआ था|इसके अलावा समूचा दक्षिण भारत भी इस विद्रोह से पूरी तरह से अछूता रहा|
         

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