स्वामी दयानन्द सरस्वती

स्वामी दयानन्द सरस्वती
  • 19वीं शताब्दी के सामाजिक और धार्मिक पुनर्जागरण के अंतर्गत समाज और धर्म में सुधार लाने के लिए तत्कालीन भारतीय समाज में चिंतन की दो धाराएँ विद्यमान थीं| भारतीय समाज में चिंतन की पहली धारा के अंतर्गत यह स्वीकार किया गया कि यदिभारतीय धर्म और समाज में सुधार करना है तो हमें पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान को अपनाना पड़ेगा, क्योंकि पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान आधुनिक है और इसे अपनाकर हिन्दू समाज में जागृति लायी जा सकती हैइससेसमाज में नैतिक मूल्यों की स्थापना होगी|चिंतन के इस धाराके नेतृत्वकर्ता राजा राममोहन राय थे|
  • भारतीय समाज के चिंतन की दूसरी धारा का तर्क था किभारतीय धर्म और समाज में सुधार लाने के लिए पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान का सहारा लेने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि इसके लिए हमें अपने अतीत में झांकना होगा|हमारा अतीत स्वर्णिम था,हमारा अतीत सामाजिक समरसता और धार्मिक श्रेष्ठताका काल था|अपने अतीत को स्वीकार कर लेने मात्र से ही हम वर्तमान सामाजिक और धार्मिक बुराइयों को आसानीसे दूर कर सकते हैं|
  • ऐसा माना गया कि वैदिक कालीन भारत में मूर्ति पूजा,अवतारवाद, छुआ-छूत, जात-पात का भेद औरपर्दा प्रथा जैसी बुराइयाँ व्याप्त नहीं थीं| यदि हम फिर से वैदिक काल में लौट चलें, यदि एक बार फिर सेहम वैदिक धर्मं, सभ्यता और संस्कृति को अपना लें तो, इन सामाजिक बुराइयों से स्वतः मुक्ति मिल सकती है|इस दूसरी धारा को मानने वाले नेता स्वामी दयानंद सरस्वती थे|
  • स्वामी दयानन्द सरस्वती का मानना था कि सत्य केवल वेदों में ही नीहित है और यदि हम वेदों को समझ लें तो हम सभी प्रकार के ज्ञान से परीचित हो सकते हैं, इसलिए इन्होंनेवेदों की ओर लौटोका नारा दिया|स्वामी दयानन्द सरस्वती पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान और दर्शन से दूर रहने पर बल देते थे|
  • दयानन्द सरस्वती के बचपन का नाम मूल शंकर था|बचपन में इनकी मुलाकात स्वामी पूर्णानंद से हुई|स्वामीपूर्णानंद ने ही इनको दयानन्दसरस्वतीका नाम दिया| दयानन्द सरस्वती को भारत का मार्टिन लूथर किंग के नाम से जाना जाता है|
  • जब स्वामी दयानन्द सरस्वती मथुरायात्रा पर थे, तबमथुरा में ही इनकी मुलाकात स्वामी बिरजानंद से हुई और इन्होंनेस्वामी बिरजानंद को अपना गुरु स्वीकार कर लिया| स्वामी बिरजानंद भारतीय धर्म,संस्कृति और सभ्यता के वाहक के रूप में थे|
  • अपने गुरु से प्रेरित होकरस्वामी दयानन्द सरस्वती ने उनसे वादा किया था कि,जब तक मैंपूरे भारत मेंपुनःभारतीय धर्म और संस्कृतिकोस्थापित नहीं कर लूँगा, तब तक मैं चैन से नहीं बैठूँगा|अपने गुरु से किये गये वादे को पूरा करने के लिए,इन्होंने1875 ई० में मुंबई में आर्य समाज की स्थापनाकी,आर्य समाज का मुख्यालय लाहौर में बनायागया था|
  • स्वामी दयानन्द सरस्वती नेपूरे भारत में भारतीय धर्म और संस्कृति का प्रचार-प्रसार किया|इनका मानना था कि भारत में पिछड़ेपन का मूल कारण अज्ञानता है,इसलिए इन्होंनेसर्वाधिक बल भारतीय शिक्षा पर दिया|
  • आर्य समाज पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक लोकप्रिय हुआ|स्वामी दयानन्द सरस्वती नेजाति प्रथा का तो विरोध किया था, किन्तु इन्होंने वर्ण व्यवस्था का समर्थन किया था|दयानन्द सरस्वती का तर्क थाकि यदि हम वेदों को सही तरह से जान लें तो, हमें ज्ञान को कहीं और से मांगने की जरुरत नहीं होगी|
  • 19वीं शताब्दी में तथाकथित नीची जातियों ने समाज में सम्मान पाने के लिए ईसाई धर्म को स्वीकार कर लिया था|भारतीय समाज के जिन लोगों ने ईसाई धर्मं को स्वीकार कर लिया था, उन्हें फिर से हिन्दू बनाने के लिए इन्होंनेशुद्धि आन्दोलन चलाया था| दयानन्द सरस्वती पहले ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने सबसे पहले स्वराजशब्द का प्रयोग किया था|इनका मानना था कि भारत सिर्फ भारतीयों के लिए है|
  • दयानन्द सरस्वती पहले ऐसे भारतीय थे, जिन्होंने भारत में सबसे पहलेविदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया| इनका कहना था कि हमें विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करके केवल स्वदेशी वस्तुओं को ही अपनाना चाहिए और जब हम विदेशी वस्तुओं का उपयोग करना बंद कर देंगे तो, विदेशी स्वयं ही थक-हार कर यहाँ से वापस चले जायेंगे|इन्होंनेहिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार किया|
  • दयानन्द सरस्वती ने 1882ई० में गोरक्षा समिति का गठन किया|स्वामी दयानन्द सरस्वती का मानना था कि भारत में पिछड़ेपन का विकास शिक्षा के आभाव के कारण हुआ है,इसलिए दयानन्द सरस्वती के विचारों के आधार पर आर्य समाज ने भारतवर्ष में जगह-जगह विद्यालय खोलने शुरू किये|इस प्रकार आर्य समाज का सर्वाधिक योगदान शिक्षा के प्रचार-प्रसार पर था|
  • दयानन्द सरस्वती की मृत्यु के पश्चात इनके शिष्यों में शिक्षा का माध्यम क्या होना चाहिए? इस बात को लेकर विवाद हो गया| इनके शिष्यों में कुछ लोग शिक्षा का माध्यम हिन्दी को बनाये जाने पर बल दे रहे थे, जबकि कुछ लोग शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी को बनाये जाने के पक्षधर थे|
  • स्वामी दयानन्द सरस्वती के शिष्यों में लाला हंसराजऔर स्वामी श्रद्धानन्द प्रमुख शिष्य थे| लाला हंसराज अंग्रेजी शिक्षा के समर्थक थे जबकिदूसरे प्रमुख शिष्य स्वामी श्रद्धानन्द हिन्दी और संस्कृत में शिक्षा दिए जाने के समर्थक थे|
  • लाला हंसराज ने अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा देने के लिए 1886 ई०में लाहौर में दयानन्द एंग्लो वैदिक कॉलेज की स्थापना की| इसके बाद भारत के विभिन्न शहरों में भीदयानन्द एंग्लो वैदिक कॉलेज खोले गये|
  • स्वामी श्रद्धानन्द ने संस्कृत और हिंदी को शिक्षा का माध्यम बनाने के लिए हरिद्वार के निकट कांगड़ी में 1902 ई० में गुरुकुल विद्यालय की स्थापना की थी|
  • स्वामी दयानन्द सरस्वती की तीन प्रमुख पुस्तकें हैं –
  • सत्यार्थ प्रकाश (1874)
  • वेदभाष्य
  • वेदभाष्य भूमिका
  • 1906 ई० में एक ब्रिटिश अधिकारी वेलेंटाईन शिरोल भारत आये| भारत आकर उन्होंनेभारतीय समाज में व्याप्त आशांति के कारणों का पता लगाया| वेलेंटाईन शिरोल ने अपनी रिपोर्ट में व्यक्ति के रूप में बाल गंगाधर तिलक को और एक संस्था के रूप में आर्य समाज को इसका उत्तरदायी ठहराया था|
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