1857 की क्रांति के कारण

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  • 1757 की क्रांति के बाद अंग्रेजी हुकुमत को बंगाल में सत्ता प्राप्त हुई|1757ई० से लेकर 1857 ई० तक लगभग 100 वर्षों के शासनकाल में ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार होता गया और साथ ही अंग्रेज भारत में अपने विभिन्न सामाजिक, आर्थिकऔर प्रशासनिक नीतियों को भारत में लागू करते गये उदहारण के लिए- भूराजस्व के क्षेत्र में उन्होंने तीन तरह के नियम लागू किये थे|उनका समस्त उद्देश्य औपनिवेशिक हितों से प्रेरित था|
  • 100 वर्षों के शासन काल में ब्रिटिश नीतियोंके खिलाफ भारतीय समाज में जो असंतोष पैदा होता रहा, वह 1857 ई० की चर्बी कारतूस वाली घटना नेबारूद में चिंगारी लगाने काकाम किया|1857 ई०के विद्रोह के कारण दीर्घकालिक थे और ब्रिटिश चरित्र में नीहित थे|पिछले 100 वर्षोंमें अंग्रेजों ने जो भी सामाजिक, आर्थिक, प्रशासनिक और राजनीतिक नीतियाँ अपनाई, वे सभीऔपनिवेशिक हितों से प्रेरित थीं, उन नीतियों में भारतीय हित नहीं के बराबर थे|
  • अंग्रजों ने भारत में जो भी नीतियाँलागू की, उससे भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों का शोषण हुआ|भूराजस्व व्यवस्था के द्वारा किसानों का शोषण किया गया, बगान मालिकों द्वारा जबरन मजदूरों से काम करवाया गया, किसानों से जबरन उनके खेतों में खाद्यान्नों की जगह नगदी फसल उगाये गये, इस तरहकिसानों का उत्पीड़न हुआ|
  • सहायक संधिऔर गोद लेने की प्रथा का निषेधकरके भारतीय राजाओं से उनका राज्य छीन लिया गया|इससे यहाँ के शासकों का उत्पीड़न हुआ|राजाओं में आस्था रखने वाली जनता राजा को उनके धर्मं और संस्कृति का संरक्षक मानती थी,जब उसने देखा की ऐसे राजा भी अपदस्त कर दिए गये जो अंग्रेजों के मित्र थे, ऐसी स्थिति में भारतीय जनता का अंग्रेजों के खिलाफ एक घृणा की भावना उत्पन्न हो गई|
  • 1857 ई०के आते-आते अचानक चर्बी युक्त कारतूस की घटनाने जनता की धार्मिक भावनाओं को आहत किया| यही कारण था कि जब 10 मई,1857 ई० कोमेरठ में सैनिकों ने विद्रोह किया और दिल्ली की ओर मुग़ल शासक बहादुरशाह के पास नेतृत्व करने के लिए चल पड़े तो भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों ने इस विद्रोह का साथ दिया|
  • 1857 ई० के विद्रोह का मुख्य कारण ब्रिटिश कंपनी के शासन द्वारा भारतीय जनता का आर्थिक शोषण करना था|
1857 ई० के विद्रोह का आर्थिक कारणों को संक्षेप में निम्नलिखित बिन्दुओं के माध्यम से समझा जा सकता है-
  • नई भूराजस्व व्यवस्था
  • करों में वृद्धि
  • हस्त-शिल्प और कुटीर उद्योगों का पतन
  • बागानों और मील मजदूरों द्वारा बेगार श्रम में वृद्धि
            1857 के विद्रोह का राजनैतिक कारण-
  • भारतीय सत्ता का प्रतीक अभी भी मुगल बादशाह था|हलाँकिमुग़ल बादशाहऔरंगजेब की मृत्यु के पश्चात मुग़ल सत्ता कमजोर हो चुकी थी|अनेक छोटे-छोटे राज्य स्वयं को स्वतंत्र शासक के रूप में घोषित कर चुके थे|
  • स्वतंत्र हो चुके राज्यों ने अपनी आन्तरिक नीतियों का निर्धारण स्वयं किया|मुग़ल शासक का इन राज्यों पर अब किसी प्रकार का जोर नहीं चलता था, लेकिन फिर भी नाममात्र के लिए ही सही मुग़ल बादशाह इन राज्यों को स्वतंत्र रूप सेशासन चलाने के लिए अनुमति प्रदान करता था|
  • जिस तरह से छोटे-छोटे राज्यों को शासन चलाने के लिए मुग़ल बादशाह अनुमति प्रदान करता था, ठीक उसी प्रकार जैसे-जैसे अंग्रेजी हुकूमत भारत के राज्यों पर अधिकार करता गया, वैसे-वैसे मुग़ल सम्राट के द्वारा उन्हें भी शासन सत्ता चलाने के लिए अनुमति मिलती गई|
  • मुग़ल बादशाह, अंग्रेज गवर्नर को बहुत ही प्रेम से पुत्र अथवा बेटा कहकर संबोधित करता था|लेकिन लॉर्ड एमर्सट(1822-1828 ई०)पहला ऐसा गवर्नर था, जिसने मुग़ल बादशाह की बादशाहत को मानने से इंकार कर दिया था| इसका मानना था कि जब शासन की समस्त शक्तियाँ हमारे पास हैं तो फिर ये कैसे बादशाह हैं?
  • लॉर्ड डलहौजी,1848 से लेकर 1856 ई० तक भारत का गवर्नर-जनरल था|लॉर्ड डलहौजीने मुग़ल शासक बहादुरशाह जफरको लाल किला खाली करने का आदेश दिया| इसी के साथलॉर्ड डलहौजी ने मुग़ल बादशाह को अपना उत्तराधिकारीनियुक्त करने पर प्रतिबंध लगा दिया|
  • लॉर्ड वेलेजली, 1798 से लेकर 1805ई० तक गवर्नर-जनरल था|लॉर्ड वेलेजली घोर साम्राज्यवादी था|यह आते ही भारतीय राजाओं के राज्यों का विलय करना शुरू कर दिया| वेलेजली फ़्रांस के आक्रमण से बचने के लिए और ब्रिटिश प्रभुसत्ता को पूर्णरूप से स्थापित करने के लिए सहायक संधि की व्यूह रचना की और इन राज्यों पर सहायक संधि का भार थोप दिया|
  • भारतीय राजाओं ने डर कर सहायक संधि को स्वीकार कर लिया और अपनी विदेश नीति अंग्रेजों के हाथों में दे दिया|हालाँकि इन देशी राज्यों के शासक अपने आन्तरिकनीतियों से तो स्वतंत्र थे किन्तु उसमे भी उन्हेंपूर्णरूप से स्वतंत्रता प्राप्त नहीं थी क्योंकि जो राजा सहायक संधि को स्वीकार कर लेते थे, उन्हें अपने राज्यों में एक अंग्रेज रेजिडेंट रखना होता था और ये अंग्रेज रेजिडेंट हमेशा इन राजाओं पर नजर रखता था|
  • इस प्रकार से जो देशी शासक सहायक संधि को स्वीकार कर चुके थे, अब केवल नाममात्र के ही आन्तरिक नीतियों में स्वतंत्र थे क्योंकि उसमे भी ब्रिटिश रेजिडेंट का हस्तक्षेप होता था|
  • लॉर्ड वेलेजली की इस सहायक संधि के परिणामस्वरूप भारतीय शासक अपनी स्वतंत्रता खो चुके थे और अब ये पुनः स्वतंत्रता चाहते थे|लॉर्ड डलहौजी ने गोद लेने की प्रथा को समाप्त कर दिया|लॉर्ड डलहौजी यह आदेश दिया कि ऐसे राजा जिनका अपना पुत्र नहीं है, यदि किसी को दत्तक पुत्र स्वीकार करतेहैं तो ऐसे पुत्र को हम राजा अथवा नवाब स्वीकार नहीं करेंगे|
  • लॉर्ड डलहौजी ने यह तर्क दिया कि केवल उन्हीं पुत्रों को उत्तराधिकारी स्वीकार किया जायेगा, जो स्वयं की उत्पन्न संतान हो,जिन राज्यों के उत्तराधिकारी दत्तक पुत्र थे, ऐसे राज्यों का लॉर्ड डलहौजी ने विलय कर लिया और दत्तक पुत्रों को पेंशन दे दिया गया| कालांतर में जिन दत्तक पुत्रों को पेंशन दिया गया था उनका पेंशन भी रुकवा दिया गया|
  • 1765 ई० में इलाहबाद की दूसरी संधि के बाद से ही अवध अंग्रेजों का परममित्र राज्य था|इस संधि के बाद से ही अवध ने कभी भी अंग्रेजों के किसी भी आज्ञाकी अवहेलना नहीं किया था| यहाँ तक कि1801ई० में जब वेलेजली के कालमें अवध राज्य पर सहायक संधि थोप दिया तो अवध ने इस सहायक संधि को सहर्ष स्वीकार कर लिया था|इसके बावजूद 1856 ई० में डलहौजी के शासनकाल में अवध पर कुशासन का आरोप लगा कर उसका अंग्रेजी राज्य में विलय कर लिया|
  • वास्तव में अवध राज्य का विलय पूरी तरह से अन्यायपूर्ण था, उसे किसी भी आधार पर सही ठहराया ही नहीं जा सकता था|वाजिदअली शाह ने जिस तरह शांतिपूर्ण ढंग से गद्दी छोड़ दी, उससे अवध की जनता की निष्ठा अपने राजा के प्रति और भी बढ़ गई|
            1857 के विद्रोह का सामाजिक-धार्मिक कारण-
  • 1813 ई० में इसाई मिशनरियों को भारत आनेका मौका मिला|इसके बाद ये इसाई मिशनरियां भारत में जगह-जगह अपनी संस्थाएँस्थापित करने लगीं|इससे भारतीयों में यह आशंका उभरने लगी कि अंग्रेज कहीं न कहीं हमें इसाई धर्म में परिवर्तित करने के लिए प्रयत्नशील हैं|इसी बीच अंग्रेजों ने यह विचार किया कि उच्च शिक्षण समितियों में अंग्रेजीको माध्यम बनाया जाना चाहिए|
  • भारत में जैसे-जैसे ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार होता गया वैसे-वैसे अंग्रेज अपनी नृजातीय श्रेष्ठतापर बल देने लगे और भारतीयों को असभ्य कहने लगे|अंग्रेज भारतीयों को सभ्य बनाना अपना उत्तरदायित्व समझने लगे थे|अंग्रेजों ने तमाम ऐसे प्रयासकिये जिससे भारतीयों को सभ्य बनाया जा सके, जैसे-सती प्रथा पर प्रतिबंध, बाल विवाह का निषेध, विधवा पुनर्विवाह आदि|
  • अंग्रेजों का कहना था कि हम भारतीयों पर शासन अपने लिए नहीं कर कर रहे हैं, बल्कि हम यह शासन भारतीयों को सभ्य बनानेके लिए कर रहे हैं| भारतीयों को ये सभी बातें नागवार गुजरने लगीं|अंग्रेज भारत में काले-गोरेका भेद खुल कर करने लगे थे|अतः 1857 की क्रांति में सामाजिक और धार्मिक कारणों ने भी महत्व भूमिका निभाई थी|

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